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Title: रजोनिवृत्ति
Author: Unknown
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रजोनिवृत्ति और हारमोन रिप्लेसमेंट थैरेपी रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ रही महिलाओं की मुख्य चिंता यह रहती है कि वे  हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी  कराएँ...

रजोनिवृत्ति और हारमोन रिप्लेसमेंट थैरेपी

रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ रही महिलाओं की मुख्य चिंता यह रहती है कि वे हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी कराएँ या नहीं। रजोनिवृत्ति के बाद इस्ट्रोजेन, टेस्टॉस्टेरॉन और प्रोजेस्ट्रोन जैसे हारमोन का स्तर बनाए रखने के लिए महिलाओं को रोजाना हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी दी जाती है। स्त्रीरोग विशेषज्ञ मरीज देखने के बाद ही तय करती हैं कि मरीज को पैच लगाना है या क्रीम से ही काम चल सकता है। 

अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि एक उम्र के बाद महिलाओं को ही हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी क्यों करवाना पड़ती है। इसका उत्तर यह है कि महिलाओं के शरीर में रजोनिवृत्ति की शुरूआत होते ही ये हारमोन बनना कम होने लगता है। एक समय बाद इनका उत्पादन पूरी तरह बंद हो जाता है। इनकी अनुपस्थिति में महिलाओं को हॉट फ्लेशेस आते हैं। रात को सोते समय चेहरा और धड़ पसीने-पसीने हो जाता है। अनिद्रा की समस्या होती है तथा मूड स्विंग होने लगते हैं। योनि शुष्क हो जाती है। इन सब लक्षणों के चलते महिला के जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है। सभी महिलाओं को हारमोन रिप्लेसमेंट की जरूरत होती है ऐसा भी नहीं है।

रजोनिवृत्ति के लक्षणों का असर कम करने के लिए क्या करें? 
हॉट फ्लेशेस, रात को सोते समय पसीने में भीग जाना, अनिद्रा, शुष्क योनि एवं यौनेच्छा में कमी को दूर करने के लिए महिलाएं जीवनशैली में परिवर्तन कर सकती हैं। नियमित एक्सरसाइज, स्वास्थप्रद भोजन तथा तनाव शैथिल्य के लिए योग एवं ध्यान से मदद मिलती है। इसके अलावा जिन महिलाओं को हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी सूट नहीं करती है उन्हें अवसाद दूर करने वाली औषधियाँ लेने की सलाह भी चिकित्सक दे सकते हैं।

क्या सोयाबीन के प्रयोग की वैकल्पिक चिकित्सा फायदेमंद होगी? 
अध्ययन बताते हैं कि प्राकृतिक चिकित्सा का रजोनिवृत्ति के लक्षणों पर बहुत फायदेमंद नहीं होती। सोयाबीन से हॉट फ्लेशेस एवं पसीना आने जैसे लक्षणों कुछ फायदा तो होता है लेकिन जो महिलाएं हारमोन से संबंधित स्तन, गर्भाशय एवं अंडाशय कैंसर के जोखिम पर हैं उनके लिए यह घातक भी साबित होता है। 

क्या मेरी हारमोन थेरेपी के लिए यह सही वक्त है? 
यह तथ्यों पर निर्धारित होता है कि हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी आपके लिए सर्वश्रेष्ठ विकल्प है या नहीं। इसमें उम्र सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होता है। यह स्त्रीरोग विशेषज्ञ तय करेंगे कि क्या आपका गर्भाशय निकालना ठीक रहेगा या नहीं। या कि आपके परिवार में स्तनकैंसर की हिस्ट्री है या नहीं। इन सब तथ्यों पर विचार के बाद ही तय किया जाता है कि महिला को हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी देना है या नहीं।

क्या जोखिम हैं 
हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी दो धारी तलवार पर चलने जैसा है। कई महिलाओं में इस थेरेपी से स्तनकैंसर, दौरे पड़ने तथा खून के थक्के जमने का जोखिम होता है। यदि केवल इस्ट्रोजेन नामक हारमोन की खुराक ही दी जा रही हो तो स्तनकैंसर का जोखिम भी कम रहता है। कुल मिलाकर इस थेरेपी के नुकसान एवं फायदों को पूरी तरह तौलकर ही शुरूआत की जाती है।

मासिक चक्र की समस्या का यौगिक उपचार

यह आवश्यक है कि कभी भी अत्यधिक ज़ोर पड़ने वाला कार्य न किया जाए, परंतु सावधानी को छोड़कर अन्य कोई कारण नहीं है कि महिलाएँ मासिक धर्म के दौरान अभ्यास बंद कर दें। 

सूर्य नमस्कार 
इससे प्राणशक्ति का स्तर ऊपर उठेगा और स्नायविक अंतःस्रावी क्रियाओं में संतुलन आएगा। अपनी क्षमतानुसार धीरे-धीरे बढ़ाकर बारह चक्रों तक अभ्यास कीजिए।

आसन 
श्रोणि प्रदेश से ऊर्जा अवरोधों को दूर करने का सबसे प्रभावी उपाय है शक्ति बंध समूह के आसन, इसके अलावा वज्रासन समूह से वज्रासन, उष्ट्रासन, मार्जारि आसन, व्याघ्रासन, शशांकासन, सुप्त वज्रासन, शशांक भुजंगासन। पीछे झुकने वाले आसन जैसे-भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, चक्रासन, कंधरासन, ग्रीवासन।

अन्य अभ्यास
-पश्चिमोत्तासन, मत्स्यासन, ताड़ासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, उत्थानासन, पाद हस्तासन, हनुमानासन। सिर नीचे करके किए जाने वाले आसन करना विशेष लाभदायी है, क्योंकि उनसे प्रजनन अंगों से रक्त का प्रवाह उल्टी दिशा में होता है एवं अवरोधक मलों का निष्कासन होता है। साथ ही पीयूष ग्रंथि पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। परंतु इन आसनों को मासिक धर्म के दौरान नहीं करना चाहिए।

प्राणायाम 
नाड़ी शोधन, उज्जायी एवं भ्रामरी प्राणासन रजःकाल के साथ जुड़े सरदर्द, माइग्रेन तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों को दूर करने के लिए प्रभावकारी हैं। प्राणायाम द्वारा अतीन्द्रिय स्तरों तक से तनाव दूर हो जाते हैं और मानसिक शांति मिलती है। अंग उतरने एवं गर्भाशय मुखशोथ (सरविसाइटिस) के लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम की तृतीय अवस्था, जिसमें मूलबंध एवं जालंधर बंध का अभ्यास किया जाता है, सर्वाधिक प्रभावकारी है। भस्त्रिका प्राणायाम द्वारा जीवनीशक्ति बढ़ती है एवं विषाक्त तत्व साफ होते हैं। इसको अनार्तव (एम्नोरोह्य) एवं कष्टार्तव (डिसमेनोरोह्य) के लिए अनुशंसित किया जाता है।

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